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दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान नूरमहल आश्रम में मासिक भंडारे का आयोजन किया गया

नूरमहल 12 मार्च (रमेश कुमार ) जैसे एक प्यासे को पानी की तलाश होती है और एक भूखे व्यक्ति को खाने की जरुरत होती है, ठीक उसी प्रकार एक साधक को अपनी आत्मा की तृप्ति के लिए सत्संग और गुरु भक्ति की जरुरत होती है। जिसका रसपान करने के लिए दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान, नूरमहल आश्रम के मासिक आध्यात्मिक कार्यक्रम एवं भंडारे में विशाल संगत का समूह एकत्रित हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत में स्वामी मनेश्वरानन्द जी ने बताया कि कभी भी किसी इन्सान को समय से पहले और कर्म से ज्यादा उसकी प्राप्ति नहीं होती, लेकिन अगर गुरु की कृपा हो तो साधक अपने सच्चे प्रेम और भाव के द्वारा इसे बड़ी ही आसानी से प्राप्त कर लेता है।
सत्संग की निर्मल गंगा में बहते हुए साध्वी ब्रह्मनिष्ठा भारती जी ने एक शिष्य का गुरु के प्रति समर्पण बताते हुए कहा कि जैसे एक स्वर्णकार सोने को कसौटी पर कसकर देखता है कि यह वास्तव में सोना है या सोने का पानी चढ़ा हुआ है, ठीक उसी प्रकार गुरु भी अपने शिष्य की श्रद्धा, विश्वास और समर्पण को कसौटी पर कसकर देखता है कि यह सोने के समान सदा ही चमकदार रहेगा या परिस्थितियों के प्रभाव से, परीक्षाओं के आगमन से कहीं ये धूमिल तो नहीं हो जायेगा। जब शिष्य गुरु की इस कसौटी पर खरा उतर जाता है तो गुरु के मुख पर अपने शिष्य को देख कर के ऐसी चमक आती है जैसी एक जोहरी के मुख पर तब आती है जब वो कांच के ढेर से हीरे को निकाल कर सब के समक्ष रख देता है। साध्वी जी ने बताया कि प्रत्येक शिष्य की यही कामना होती है ही उसके गुरु का मुख प्रसन्नता से चमकता रहे। इसके लिए उसे स्वयं को कठपुतली की तरह गुरु के आगे समर्पण करना होगा।
आगे स्वामी गुरूकृपानन्द जी ने बताया कि साधक स्वार्थी नहीं बल्कि परमार्थी होता है। कहने का भाव पूर्ण गुरु के द्वारा वह स्वयं अपनी आत्मा का साक्षात्कार तो करता ही है इसी के साथ समस्त संसार के कल्याण हेतु वह ब्रह्मज्ञान का प्रचार प्रसार करना उसका परम धर्म होता है।

Monthly Bhandara was organized at Divya Jyoti Jagrati Sansthan Noormahal Ashram.

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