आज हम इस जीवन की भागदौड़ में इतने व्यस्त हैं कि हमारा ध्यान भी विचलित होता है । स्वामी जी ने कहा कि यह स्वभाविक है क्यूंकि भौतिकवाद के इस युग में समाज की गति भी तेज होती जा रही है और इस गति में हमने अपने मन को केंद्रित कर के प्रार्थना के भाव अपने हृदय में धारण कर के प्रभु को याद करना है।
इसलिए हमें कोई तो ऐसा चाहिए जो हमारे इस सफर में हमें हौसला दे और हमारा मार्ग प्रशस्त करे ता कि हम आत्माएं भी भक्तों, सन्तों की तरह अपनी मंजिल प्रभु तक पहुंच पाएं। साध्वी जी ने कहा कि एक साधक की साधकता के निर्माण में गुरु की भूमिका सर्वोपरी होती है क्यूंकि गुरु ही है जो एक अधोगामी मन को उर्ध्वगामी बनाता है। हमें चेतनायुक्त एवं विवेकशील बनाकर विवेक दृष्टि प्रदान करता है ता कि हम अपने जीवन को सफल और सार्थक कर पाएं।
कोई भी इस जेल से यानि इस भाव बंधन से मुक्ति की मांग नहीं करता। कोई विरला ही व्यक्ति होता है, जो महापुरषों से उस शाश्वत ब्रह्मज्ञान की मांग कर संसार के कारावास से मुक्त होता है। स्वामी जी ने बताया की हमारा प्रयास यही है कि जन साधारण को जीवन में सही चुनाव करने का विवेक मिले। हर जीवात्मा भव-बंधनों से मुक्ति पाने की अभिलाषी बने।